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Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 27th Dec 2015 || Day 2,Part ll

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 27th Dec 2015 || Day 2


अध्यात्म का अर्थ है जो स्वभाव की ओर लेकर आये जिससे अपने स्वरूप का बोध हो। जब व्यक्ति अपने स्वभाव को उपलब्ध होता है तब उसके पास भगवदीय सामर्थ्य उजागर हो जाती है। हमारी संस्कृति नर से नारायण बनाने वाली संस्कृति है। 

वेद के अनुसार यह कहा गया -अमृतस्य पुत्रा -हम अमृत की संतानें हैं। हमारी आध्यात्मिक यात्रा तभी संपन्न होती है जब हम अपनी अनंतता को उपलब्ध हो जाते हैं। अपनी नित्यता हर पल है। अब तो विज्ञान भी कहता है कोई चीज़ बदलती तो है लेकिन रूप बदलने के बाद भी वह रहती तो है। सदा रहती है सदा। तो जो नित्य तत्व है अपराजेय तत्व है ,शाश्वत तत्व है उस तत्व का बोध कराने वाली हमारी यह संस्कृति है। वेदों का एक ही घोष है मनुष्य केवल एक ही काम करे और वह ही उसके लिए आवश्यक है। वह अपने नित्य सनातन स्वरूप का बोध करे। वह भोर में उठकर शुभ संकल्प करे। और वह अपने स्वरूप को उपलब्ध हो। 

हम अपने पाथेय को विस्मृत न कर बैठें। भारतीय संस्कृति यह कहती है अपने स्वरूप को पहचानो  जो अपराजेय है। हमारी संस्कृति देह की मृत्यु की तो बात कहती है पर आत्मा की अमरता का भी सन्देश देती है। कोई ऐसा पदार्थ नहीं है जो मृत्यु के मुंह में न हो। लेकिन हमारी संस्कृति कहती है ,आत्मा नित्य है शाश्वत है। जिस दिन अपने स्वरूप का बोध होता है उस दिन व्यक्ति आनंद से ,अनुराग  से भर उठता है। 

यह कथा ज्ञान की सिद्धि के लिए भी है। यह कथा उपासना के भाव को जागृत करती है। और निष्काम कर्म योग में भी निष्णात करती है। सच तो यह है ,कथा सुनने के बाद हमें अपनी श्रेणी का ,अपनी कोटि का ,अपनी अवस्था का बोध हो जाता है। हम भक्त हैं तो भक्ति सिद्ध होगी। निष्काम कर्म योगी हैं तो सफलता की यहां से प्रेरणा मिलेगी। और यदि हम ज्ञान के उपासक हैं ,अपने स्वरूप के बोध के लिए कथा से  हमें अपार ऊर्जा मिलती है। 

कथा अत्यंत प्राचीन विधा है। इसलिए यह बात कही भी गई है हम श्रवण करें। 

श्रवण मंगलम। 


श्रवण से मांगल्य होता है और श्रवण पहला साधन भी है। जो हमें हमारे स्वभाव ,निजता की ओर लाता है। प्रसंग  इस तरह से आता है ,जब इस धरती पर व्याकुलता बढ़ गई ,उन्माद ,दमन ,अनीति ,अत्याचार ,भंडारण की जब प्रवृत्तियां बहुत प्रचंड हो गईं तब धरती पर कोई युग पुरुष आये और यहां व्यवस्था दे  ,ऐसी मांग बन गई। 

धरा पर बीज नहीं बो सकते आप। उसका फल नहीं ले सकते। तो किसी दैत्य ने पूरी धरती के अधिकार अपने पास अर्जित कर लिए। उसे हिरण्याक्ष कहा गया। जिसका सोने (स्वर्ण )पर ध्यान था ,धरती पर ध्यान था ,जितने भी धरा पर बहुमूल्य पदार्थ हैं ,मेरे हैं। वह ऐसा मानने लगा। 

न केवल धरा ,अग्नि ,वायु ,औषधि सब पर उसके अधिकार थे। आप कल्पना कर सकते हैं ,स्वर्ग में भी उसके अधिकार थे। व्यक्ति की पहली भूख है जिजीविषा। 

मैं राम अवतरण की कथा आरम्भ करूँ उससे पहले मैं व्यक्ति की पहली कामना से परिचय कराना चाहूंगा। जो मनुष्य की पहली कामना है वह जीना है ,जिजीविषा है। 

दूसरी कामना है सुख पूर्वक जीना और तीसरी कामना है -वह अपने अधीन रखना चाहता है सबको। अपनी कीर्ति को अक्षुण रखना चाहता है शीर्षस्थ होना चाहता। अपने मान सम्मान के नित्य विस्तार में रहता है। एक और बात -वह 'स्वयं -भू' होना चाहता है। 

हिरण्याक्ष आये ,हिरण्यकश्यप आये -न सुबह मरूँ न सांझ ,तो मनुष्य की पहली भूख क्या है वह ज़िंदा रहना चाहता है। सुख में वह अनुकूलता चाहता है ,सब मेरे अनुकूल रहें सब मेरे आधीन रहें। 

आदि दैत्य  हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप की कथा ,राम रावण से पहले आती है। 

ये धरती मेरी है यहां का सुख सामान यहां की सम्पदा मेरी है। ऐसी कुछ प्रवृत्तियां पश्चिम की भी हैं वहां तुलसी ,नीम ,बबूल ,पीपल , बिल्व ,हल्दी आदि नहीं होते।  लेकिन इन सब पर पेटेंट चाहते हैं वे। 

यहां जो कुछ भी अलौकिक है वह मेरा हो जाए -इसे आसुरी प्रवृत्ति  कहते हैं। भंडारण की जो प्रवृत्ति है ये आसुरी प्रवृत्ति है। योग पर भी वे अपना पेटेंट चाहते हैं। लेकिन हमारी संस्कृति सबको विश्व -कुटुंब को बांटने की प्रवृत्ति है। वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति है सबको बांटने की संस्कृति है।'होता 'यज्ञ की हरेक आहुति में कहता है यह मेरा नहीं है।यह मेरा नहीं है।  

जिसने अपनी  इन्द्रियाँ को जीत लिया है वही दशरथ प्रवृत्ति है। अंबर में छलांग लगाईं दशरथ ने स्वर्ग की रक्षा के लिए। जो देवताओं से भी न जीती जा सके उस नगरी का नाम अयोध्या है। 

संसार की सबसे प्राचीन नगरी है अयोध्या। पहला मानव इस धरती पर कोई आया है तो वह अयोध्या में आया है।ब्रह्मा के मन में कोई पहली  कामना जगी तो वह यह मैं इसे पूरा करूँ। 

मनु ही धरती पर दशरथ बनकर आएं हैं। हमारी पहली समस्या है -संवाद हीनता। किसी एक ऋषि के मन में यह आया कोई ऐसी व्यवस्था हो जो इस धरती को अभय दे। संवाद दे। 

भंडारण  की आसुरी प्रवृत्ति को पनपने न दे। इस धरती की अराजकता ,शोषण को दूर करने के लिए कोई एक अवतरण होना चाहिए। 

मनु और शतरूपा इसी हेतु आये हैं।पूरी धरती को सुख देने के लिए तप किया गया दोनों के द्वारा -कोई दिव्य पुरुष दिया जाए धरती को जो इस धरती को व्यवस्था दे। ऐसा संकल्प दोनों ने किया। 

अगर भजन ठीक नहीं चल रहा है तो अपना भोजन ठीक करें। आहार शुद्धि ही आपको स्वीकृति अस्वीकृति देगा। हेय  का आप त्याग करेंगे।निंदनीय को छोड़ेंगे ,जो ग्राह्य है वही आप लेंगे। आप जो भी ग्रहण करें उसे पहले भगवान् को समर्पित करें वह प्रसाद बन जाएगा। प्रसाद का अर्थ है प्रसन्नता। 

ये दोनों दैत्य ही- रावण और अह रावण  के रूप में आये। 

राम के अवतरण में मनु शतरूपा का तप है ,और तप तब होता है जब पेट भरा हो ,जब सारे भोग आपने भोग लिए हों जब सारी वस्तुएं आपको प्राप्त हों। जो फटे हाल हैं ,कंगाल हैं ,वे समझ नहीं पाएंगे। ऊंची सौध पर बैठने के बाद ही त्याग किया जा सकता है जिसने उच्च पद प्राप्त कर लिया हो वही त्याग कर सकता है।

वर्धमान ने ,बुद्ध ने ऋषभदेव ने पूरी धरती के सुख प्राप्त करने के बाद संन्यास लिया है। संन्यास कहते हैं सम्यक कामनाओं का न्यास। जिनके पास कुछ है वही संन्यास ले पाते हैं। 

एक दिव्यपुरुष धरती को दिया जाए ,एक नै व्यवस्था पृथ्वी को दी जाए इसके लिए मनु और शतरूपा तप करने बैठे। (ये दोनों ही मानसी सृष्टि थे ब्रह्मा जी की ,जिनके तप से सृष्टि पैदा हुई ,कृष्ण/महाविष्णु  ने चाहा मैं एक से अनेक हो जाऊं और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी पैदा हो गए उनसे सारी सृष्टि ......  ). 

आहार शुद्धि ,तत्व शुद्धि तप का पहला साधन बतलाया गया है हमारे शास्त्रों में। यदि हम प्रकाश मार्ग पर चलना चाहतें हैं तो पहले आहार शुद्ध करना होगा। जो यह कह रहे हैं हमारा भजन ठीक नहीं चल रहा है जप ठीक नहीं चल रहा है ,हम ध्यानस्थ नहीं हो पाते हैं ,एकाग्र नहीं हो पाते हैं चित्त में एकाग्रता और स्थिरता नहीं रहती तो यह ध्यान रहे वह अपना भोजन ठीक करें। जो आपकी थाली में रखा है बस वही आप बनने वाले हैं आहार ही आपको आकार देगा। आहार ही आपको विचार देगा ,वृत्तियाँ ,प्रवृत्तियां देगा। आहार में ही एक स्वीकृति अस्वीकृति पैदा होगी यह ध्यान रहे। 

आहार आपका शुद्ध है तो आप त्याग करना चाहते हैं। वह ग्रहण करना चाहते हैं जो शुद्ध है जो हेय है भयकारक है आप उसका त्याग करना चाहते हैं। 

आहार यदि आपका शुद्ध नहीं है तब आप ऐसा आहार करना चाहते हैं जो विष है निंदनीय है।पूरे संसार में अगर आहार शुद्धि की चर्चा हो रही है तो केवल भारत में। 

आहार मितभोजी होना चाहिए उसमें मात्राज्ञता  होनी चाहिए। कितनी मात्रा में लिया जाए ?आहार सुपाच्य होना चाहिए।आहार आपका प्रसाद बन जाए। प्रसाद माने प्रसन्नता।  आप पहले भगवान् को आहार समर्पित करें  फिर वह प्रसाद बन जाएगा। 

करहिं आहार शाक फल कंदा, 

 सुमरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा। 

उर अभिलाष निरंतर होई ,

देखहुँ नैन परम प्रभु सोही। 

वेद में वीर्य के पावित्र्य , रज शुद्धि की विधि बताई है।के कितनी पीढ़ी में रक्त ,धातुएं ,मैद ,रुधिर ,वीर्य ,मज्जा ,रस ,प्राण ,विचार ,मति ,संकल्प पवित्र हो , शुद्ध हो जाएंगे।एक गर्भाधान करने में मनु शतरूपा को  बारह बरस लग गए। बारह बरस तक लगातार एक तप किया मनु और शतरूपा ने। एक व्रत किया पहले।मन पर काम किया उन्होंने ,विचार पर काम किया। ये सब उत्तम कोटि की संतान के लिए किया। हम ओस की एक बूँद की तरह स्वाभाविक हो जाएँ। आकाशगंगा में वह जो दूधिया सागर है वैसे सहज हो जाएँ।धवल चादर से हम सहज हो जाएँ।  जिस दिन सिंह हमारे पास आकर बैठ जाएगा ,हमें डर नहीं लगेगा -इसके लिए अन्न की साधना की ,विचार की साधना की। 

भोजन देखने में  ग्राहीय लगे।वरना अन्न में बड़ी दुर्गन्ध है। 

अन्न औषधि है केवल भूख मिटाने के लिए नहीं है आपके अंदर एक कांति ,एक ओज आपके अंदर पैदा हो। अन्न में उन्माद न हो। उत्तेजना न हो। थाली ब्रह्म को अर्पण हो जाए। अन्न को नैवेद्य ,ईश्वरीय पदार्थ बनाइये और यह काम इन दोनों ने किया। 

अन्न से एकाग्रता आती है। निर -विचार ,निर -वितर्क अवस्था आती है। वीर्य ,रज ,अस्थि , मज़्ज़ा  सब शुद्ध कर लिए मनु शतरूपा ने । तब भगवान् ने कहा जाइये मैं आपके यहां आऊंगा। आप त्रेता युग में दशरथ और कौशल्या  होंगें। आपको ही मैं चुनूंगा माता पिता के रूप में। 

पार्वती परमात्मा को कुरेदना जानतीं हैं उन्होंने कितने प्रश्न किये -गुरु से प्रश्न किये लोक कल्याण के लिए ,जन चेतना के लिए ,आपको गुरु से प्रश्न करना आना  चाहिए पार्वती की तरह। 

पार्वती  कहतीं हैं - हमने सुना है नारद ने भगवान् को शाप दिया था। शाप तो क्रोध में ही दिया जाता है जब शरीर के अंदर विष बढ़ जाता है तब क्रोध आता है । क्रोध बिना काम के आ ही नहीं सकता ,तो क्या नारद ने क्रोध किया  शाप देने से पहले। जब व्यक्ति विचार शून्य हो जाता है तब क्रोध करता है। वह स्वयं पर नियंत्रण खो बैठता है तब क्रोध करता है।  जिसका अभ्यास सफल नहीं हुआ है वह क्रोध करता है। 

नारद के शाप के कारण भगवान नारायण (राम )बनकर आये। नारद ने इतना क्रोध क्यों किया मुझे बताइये। दमित काम जब प्रकट होता है तब क्रोध आता है। नारद के भीतर ऐसा क्या था ?मुझे बताइये प्रभु -कहतीं हैं पार्वती शिव से। 
(ज़ारी ....)     

(२ )



LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 26th Dec 2015 || Day 1
अध्यात्म का अर्थ है जो स्वभाव की ओर लेकर आये जिससे अपने स्वरूप का बोध हो। जब व्यक्ति अपने स्वभाव को उपलब्ध होता है तब उसके पास 





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