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Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 1, 2

कल भगवान् ने धनुष भंग किया था। भगवान् ने उस के दो खंड कर दिए ,कैसे भगवान् ने उस धनुष को  देखा ,कब उठाया ,बीच में क्या हुआ न कोई जान पाया न देख पाया न समझ पाया -सबने बस इतना देखा धनुध दो खंडों में भूमि पर टूटा हुआ पड़ा है। भगवान् जो करता है उसे दिखाता नहीं है बस वह हो जाता है हमें दिखाई नहीं देता। भगवान् जो देता है वह दिखाई नहीं देता ,किधर से क्या कर गया भगवान् दिखाई नहीं देता। बस हो जाता है।

 हम हल्ला बहुत करते हैं ,दिखावा बहुत करते हैं काम बहुत कम करते हैं ,शो बाज़ी ,शोबिजनिस ज्यादा करते हैं इसीलिए मनुष्य को कभी यश नहीं मिलता क्योंकि आप जो भी कुछ कर रहे हैं यश के लिए कर रहें हैं। 

भगवान् का अपयश कभी नहीं होता। वह यश के लिए कुछ नहीं करते हैं। बस जो भगवान् चाहते हैं वह हो जाता है। 

हमारा अहम नाक पर रखा रहता है किसी समारोह में बैठने के लिए सीट न मिले हम अपमानित महसूस करने लगते हैं। तुनक जाते हैं अपसेट हो जाते हैं ज़रा सी बात पर। भगवान् को राजभवन से निकाल दिया गया था भगवान् परम् संतुष्ट कोई असंतोष नहीं किसी को दिखाइ  दिया समभाव दिखा उनके चेहरे पर वही प्रसन्नता दिखाई दी ।इससे पूर्व जब राजतिलक की घोषणा हुई थी तब भी यही प्रसन्नता और समत्व था उनके चेहरे पर। धनुष भी उसी समत्व भाव को बनाये हुए तोड़ दिया। किसी को भी पता नहीं चला धनुष भंग का। 

इधर जय जैकार हो रहा था -

तेहि अवसर सुनी शिव धनु भंगा 

तभी चमचमाता हुआ फरसा लेकर परशुराम जी का आगमन हो  गया। जनक जी और परशुराम जी समकालीन महापुरुष हुए हैं। 

जनक जी क्षत्रीय कुल में जन्मलेते हैं लेकिन व्यवहार ऋषि योचित करते हैं ब्रह्मणों जैसा करते हैं ,हमेशा शास्त्र हाथ में रखते हैं।

जबकि शास्त्र हाथ में रखना चाहिए परशुराम  को । ब्राह्मण  परिवार में पैदा हुए थे लेकिन  परशुराम का नाम ही  फरसराम पड़  गया चोबीस घंटों इनके हाथ में फरसा रहता है जबकि ये  जन्म से ब्राह्मण  हैं।इनकी मान्यता है भय के बिना शासन नहीं चलता। इनका   व्यवहार  क्षत्रियों जैसा हैं ।

परशुराम जी का दर्शन अपूर्ण था ,धमका कर कुछ देर तो व्यवस्था आप चला सकते हैं देर तक नहीं ,विद्रोह होते देर नहीं लगती। 

जनक जी को कहते हैं :हे मूर्ख जनक !तूने इतने राजा कैसे एकत्र किये ये धनुष किसने तोड़ा?भगवान् एकदम आगे आये विनयपूर्वक बोले -जिभ्या रसना है रसीली है इससे कठोर भाषा नहीं बोलनी चाहिए। 

"नाथ शम्भु धनु -भंजन - हारा,

होइये एक दास तुम्हारा।" 

हे नाथ धनुष तोड़ने वाला कोई आपका सेवक ही होगा। सुनो राम जिसने भी धनुष तोड़ा है उसे अलग निकाल के रख दो वरना सब राजा मारे जाएंगे। 

विश्वामित्र जी से लक्ष्मण जी ने कहा आज्ञा हो तो मैं बात कर आऊँ इस बाबा से ।

बोले लक्ष्मण जी परशुराम से - हे बाबा तुम्हारा क्या लेना देना है इस धनुष से जिनका धनुष है वह शंकर जी तो नांच रहे हैं। तू कौन के खामख़्वाह।ऐसी धनुइयां तो खेल -खेल में हम ने कितनी तोड़ डाली।तब तो आपने कुछ कहा  नहीं। अब क्यों मछर रहे हो ?इस धनुष से तुम्हारी बड़ी ममता है तुम्हारा क्या मतलब है ?

कौन सी धनुइयां की बात कर रहे हो हम तो कभी अयोध्या गए नहीं बोले परशुराम जी।  तब लक्ष्मण जी ने एक बहुत पुराना किस्सा याद दिलाया -

हुआ ये के परशुराम जी को आग्नेय अस्त्र एकत्र करने का बड़ा भारी शौक  था। इनकी आयुद्ध शाला मन्त्र सिक्त अस्त्रों से जब पूरी भर गई।पृथ्वी पर बोझ बढ़ गया जो पृथ्वी के बेटे शेषनाग पर पड़ रहा था। 

 पृथ्वी पर हड़कंप मच गया आज भी यही स्थिति है इतने एटमी आयुद्ध महाशक्तियों ने एकत्र कर लिए हैं इनका अकस्मात प्रयोग हो जाए तो पृथ्वी कई बार नष्ट हो जाए। 

पृथ्वी ने घबराके एक विधवा ब्राह्मणी का भेष भरा और अपने बेटे शेष (लक्ष्मण जी )को गोद  में लेकर परशुराम जी के आश्रम में आ गईं।बाबा कोई काम मिलेगा ,मैं उपले पाथ  दिया करूंगी ,रसोई कर दिया करूंगी ,चौक  पूर दिया करूंगी और भी जो कहोगे वो सेवा करूंगी। परशुराम जी का इन्होने अपनी सेवा से धीरे -धीरे विश्वास  जीत लिया।एक बार परशुराम जी को कहीं बाहर जाना था चाबी ब्राह्मणी को सौप कर चले गए। यही तो ब्राह्मणी भेषधारी पृथ्वी चाहती थीं ,उन्होंने लक्ष्मण जो को आयुद्ध शाला में बुलाया और लक्ष्मण जी ने सारे आयुद्ध निष्प्रभ कर दिए बे -असर निष्प्रभावी कर दिया सबको क्योंकि लक्ष्मण जी वे सारे मन्त्र जानते थे। 

परशुराम जी ने लौटकर जब आयुध शाला एक दिन खोली तो हतप्रभ हो बोले ये किसने किया है ये तो सारे आयुद्ध मन्त्र सिक्त थे हर कोई इन्हें निष्प्राण कर ही नहीं सकता। मुझे सब कुछ सचसच बताओ। धरती विधवा ब्राह्मणी का भेष छोड़कर अपने असली रूप में प्रकट हुईं और सब कुछ कह दिया -ये मेरा बेटा शेष नाग है (अनंत शेष )इसके ऊपर लगातार इन आयुद्धों का भार बढ़ रहा था। अब अपरशुराम जी की इतनी हिम्मत कैसे होती साक्षात शेष नाग जब सामने खड़े हैं तो उनके सामने कुछ बोलें। लक्ष्मण जी ने यही किस्सा याद दिला दिया परशुराम जी को।

क्रोध के सामने परशुराम के विवेक के सब दरवाज़े बंद थे क्रोध में कुछ सूझ ही नहीं रहा था -क्रोध पूरी बात सुनने ही कहाँ दे रहा था। परशुराम आग बबूला हो रहे थे। बोले -ए ! राजा के लड़के !तुझे अकल नहीं है,सारा जगत जिसे जानता है उसे धनुइयां कह रहे हो। जब धनुष इतना विशेष है तो अपनी बुद्धि से ये तो सोचो -तोड़ने वाला भी विशेष ही होगा लक्ष्मण जी ने बाबा को ये कहकर फिर से हड़का दिया।  

खोटा लड़का ये बड़ा धूर्त है इसे मौत का भय नहीं है। अब लक्ष्मण जी तो साक्षात काल हैं उन्हें सब खोटा न कहें तो क्या कहें। लक्ष्मण जी तन के खड़े हो गए -परशुराम जी ने फरसा मारने के लिए उठाया लेकिन वो फरसा उठा ही नहीं।जिसे विश्वामित्र जी को सुनाते हुए उन्होंने कहा था अब इस उदण्ड बालक को कोई नहीं बचा सकता। 

फरसे का शास्त्र में अर्थ दान होता  है और दान दिखाया नहीं जाता। इसलिए फरसा उठा ही नहीं। लक्ष्मण जी समझाते हैं ,बाबा तुम्हें तो फरसा शब्द  का अर्थ भी नहीं पता। ये आपको शोभा नहीं देता लाओ हमने दो इसे। 

भगवान राम फिर आगे आ गए -

अपराधी मैं नाथ तुम्हारा .....

हे नाथ अपराधी  तो मैं हूँ ये बालक तो दूधमुख है परशुराम जी बोले ये दूधमुख नहीं है विषमुख है।जब तक तेरा भैया मेरे सामने रहेगा मेरा क्रोध  दूर नहीं होगा ,इसे मेरी आँखों से दूर करो। लक्ष्मण जी फिर मुस्काकर बोले बाबा आपअपनी आँखें बंद क्यों नहीं कर लेते? 

ओवर लुक करिये बंद कर लो आँख हर चीज़ देखी  नहीं जाती।व्यास पीठ कहती है हर चीज़ सुनो भी मत ,बच्चों की बातें होने दो ,न सुनो न उनके बीच में बोलो।हर चीज़ हर बात के लिए बच्चों को मत टोको।अशांत हो जाओगे परशुराम जी की तरह।  
अब तो परशुराम जी गन्दी -गन्दी गाली निकालने लगे भगवान् के लिए लक्ष्मण जी ये सहा नहीं गया आगे बढे बोले ये अस्त्र मुझे दो आपको शोभा नहीं देता। न गाली देना न ये अस्त्र। इतने हथियार काहे को ढ़ो रहे हो -गारी देने के लिए तो तुम्हारी जबान ही काफी है और फ़ालतू बोझा  क्यों उठा रहे हो इन अस्त्रों का। 

"गारी देत न पावहुँ  शोभा  ,

वीरपुरुष  तुम धीर अशोभा। "-बोले लक्ष्मण जी। 

आपको यूँ गारी देना शोभा नहीं देता। परशुराम बोले भगवान् से -मुझसे युद्ध करो। भगवान् बोले आप ऋषि हैं हम आप से युद्ध नहीं करेंगे। बोले परशुराम फिर राम कहलवाना बंद कर दो।मैं हूँ परशुराम। परशुराम अहंकार रखना चाहते हैं अपना। 
भगवान् ने अपना पीताम्बर हटा  दिया और अपनी छाती पर का वह चिन्ह दिखा दिया -हमने तो आपके पूर्वज ऋषि भृगु को भी कुछ नहीं कहा था  जिन्होंने हमारे सीने पर लात मारी थी। परशुराम भगावन के पैरो पर  गिर पड़े -अरे ये तो पूर्ण ब्रह्म का अवतार हैं मैं तो इनका ही अंश मात्र हूँ। और  मैं क्या- क्या अनुचित कह गया ,दोनों भाइयों से क्षमा मांगते हैं परशुराम जी। अंश अवतार का पूर्ण अवतार में विलय हो गया। परशुराम -राम मिलन संपन्न होता है। 

(आगे की कथा अगले अंक में ज़ारी रहेगी ... )

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 1


(२ )https://www.youtube.com/watch?v=eTGVDRKBkhA

(३ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 2

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