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फूल यूँ खिले, / गलबहियाँ डाले / बैठे हों बच्चे।-हाइकु के लश्कर (प्रथम हाइकु-संग्रह ‘प्रवासी मन’ में डॉ. जेन्नी शबनम)


90. हाइकु के लश्कर इतिहास रचने निकले

रमेश कुमार सोनी जी द्वारा मेरी पुस्तक 'प्रवासी मन' की समीक्षा :

   हाइकु के लश्कर इतिहास रचने निकले 

           

       अपने प्रथम हाइकु-संग्रह ‘प्रवासी मन’ में डॉ. जेन्नी शबनम ने बिना किसी उपशीर्षकों के अंतर्गत 1060 हाइकु रचते हुए हाइकु साहित्य में धमाकेदार प्रवेश किया है, जो एक लम्बे समय तक याद रखा जाएगा हाइकु जगत में आप विविध संग्रहोंपत्र-पत्रिकाओं में, पूर्व से प्रकाशित होते रहीं हैं, इस लिहाज से हाइकु-लेखन में आपका यह अनुभव इस संग्रह में बोलता है। हाइकु के संग्रहों से हिंदी साहित्य इन दिनों अटी पड़ी हैं और हाइकु विधा अब किसी परिचय की मोहताज नहीं रहीयह देश-विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार की पताका फहरा रही है। हाइकु यद्यपि तत्काल शीर्ष पर पहुँचने की विधा नहीं है अपितु यह किसी क्षण विशेष की अनुभूतियों को / संवेदनाओं को शब्दांकित करने की विधा है। मात्र सत्रह वर्णों में किसी क्षणानुभूति को रचने के लिए एक विशेष साधना की आवश्यकता होती है जो इस संग्रह में परिलक्षित होती है

       हाइकु एक पूर्ण कविता होती है हाइकु के लिए अब कोई भी विषय अछूता नहीं रहा है, इसलिए प्रकृति वर्णन से शुरू हुई यह विधा अब अपने आगोश में पूरी दुनिया को समेटना चाहती है। इस संग्रह में बिना किसी लाग-लपेट के बहुत से हाइकु प्रस्तुत हुए हैं जिसे मैं कुछ खण्डों में समेटते हुए उसकी सुन्दरता को आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि पाठकों की तन्मयता / तन्द्रा भंग न हो सके और वह अपने आपको इसकी अनुभूतियों से जोड़ सकें। मन किसी के काबू में कहाँ रहता है इसे वक्त अपनी उड़ानों के साथ विविध घटनाओं का गवाह बनाने उड़ा ले जाता हैइसका यूँ तो कोई घर नहीं होता परन्तु लौटता तो यह अपनी पुकार पर ही है हमारी सोच पर सवारी करने

लौटता कहाँ / मेरा प्रवासी मन / कोई न घर। - 1

           

       इस वैश्विक दुनिया में जब परिवार सिमटे हुए हैं तथा रिश्ते अपेक्षाओं और जरूरतों पर टिके हों तब ये उपेक्षा ही पाते हैं जब कच्चे धागों का बंधन सिसकता है, अखरने लगता है तब इसे निभाने लोग ऐसे रिश्तों से मुँह मोड़ लेते हैं। इन्हीं कारणों से कोई तीसरा उन परिवारों में सेंध लगाकर उनका सबकुछ छीन ले जाता है; इससे जुड़ी अपराधों की ख़बरें इन दिनों आम हो चली हैं वास्तव में रिश्तों को निभाना हमारी भारतीय परंपरा में परिवारों को सशक्त बनाते हैं आइए इन हाइकु के साथ अपने घरों में बुजुर्गों का सम्मान करें, माँ की ममता को तोल-मोल न करें और ऐसे ही कई गुम्फित भावों के साथ इन हाइकु से अपना सम्बन्ध जोड़ें -

तौल सके जो / नहीं कोई तराजू / माँ की ममता। - 12

चिड़िया उड़ी / बाबुल की बगिया / सूनी हो गई। - 159

छूटा है देस / चली है परदेस / गौरैया बेटी। - 1012

काठ है रिश्ता / खोखला कर देता / पैसा दीमक। - 405

वृद्ध की लाठी / बस गया विदेश / भुला वो माटी। - 882

               

       रिश्तों की असली दुनिया गाँवों में महसूस की जा सकती है जहाँ विशुद्धता साँसे लेती हैं, जहाँ निश्छल मन जीवन की संगीत लहरियाँ छेड़तीं हैं, ऐसे ही भावों के साथ नीम की छाँव तले बच्चों से मचलते हाइकु को शहर लूट ले गया है इसकी कसक देखिए -

खेलते बच्चे / बरगद की छाँव / कभी था गाँव - 29

कच्ची माटी में / जीवन का संगीत, / गाँव की रीत। - 455

      

       प्रकृति का वर्णन हाइकु का सबसे पसंदीदा विषय सदा से ही रहा है इसके तहत आपने जो हाइकु रचे हैं उन्हें पढ़ने से यह एहसास हो जाता है कि आपने प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित किया है, इसकी अनुभूतियों को गहराई तक अनुभूत किया है मौसम यद्यपि इन दिनों मानवीय गतिविधियों के चलते प्रदूषण का चोला पहने दुखदायी हो चले हैं फिर भी आपने इसकी सुन्दरता को उकेरा है इन हाइकु में कहीं - लहरें नाग हैं जो फुफकारती तो हैं पर काटती नहीं हैं, शाल इतराते हैं, सागर नाचते हैं... और प्रश्न भी है कि अमावस का चाँद कैसा होगा? -

धरती रँगी / सूरज नटखट / गुलाल फेंके। - 182

धरती ओढ़े / बादलों की छतरी / सूरज छुपा - 49

स्वेटर-शाल / मन में इतराए / जाड़ा जो आए। - 150

बेचैनी बढ़ी / चाँद पूरा जो उगा / सागर नाचा। - 475  

नहीं दिखता / अमावस का चाँद, / वो कैसा होगा? - 529

हरी ओढ़नी / भौतिकता ने छीनी / प्रकृति नग्न। - 935

             

       आइए आम्र मंजरियों के बीच झुरमुट में छिपे अपनी पसंद के आम पर निशाना लगाएँकोहरे की ललकार सुनेंरजाई में दुबके हुए सपने की कान उमेंठकर बाहर निकालें और खीरे के मचानों पर झुलने को निहारें, वाकई इनमें बिलकुल ही नयापन है ऐसे हाइकु स्वागत योग्य हैं -

मुँह तो दिखा - / कोहरा ललकारे, / सूरज छुपा। - 684

नींद से भागे / रजाई में दुबके / ठंडे सपने। - 682

खीरा-ककड़ी / लत्तर पे लटके / गर्मी के दोस्त। - 786

आम की टोली / झुरमुट में छुपी / गप्पें हाँकती। - 793

          

       भारतीय परंपरा और जीवन-संस्कृति में पर्वों और त्योहारों का अद्भुत उत्साह हम सब ने अनुभव किया है, इसके साथ ही अपने आपको ढाला है चाहे दीवाली हो, होली हो या रक्षाबंधन हो, हम सबकी उम्मीदों में इसने हमारे बचपन को जीवित रखा है। हमें वो दिन भी याद है जब हम अपने दोस्तों के साथ अपनी कलाई में बँधी राखियों की अधिक संख्या को लेकर इतराते थेनये वस्त्रों को पहनकर गलियों में फुदकते थे और इन सबके साथ हमारे घर-मोहल्ले का सीना चौड़ा हो जाता था आइए इन हाइकु के साथ दिवाली का दिया जलाएँहोली खेलें और अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लें -

दीया के संग / घर-अँगना जागे / दिवाली रात। - 61

घूँघट काढ़े / धरती इठलाती / दीया जलाती। - 333

फगुआ मन / अंग-अंग में रंग / होली आई रे। - 73

रंग अबीर / तन को रँगे, पर / मन फ़क़ीर। - 705  

सावन आया / पीहर में रौनक / उमड़ पड़ी। - 88

किसको बाँधे / हैं सारे नाते झूठे / राखी भी सोचे। - 291  


       इस चार दिन की ज़िन्दगी के विविध पड़ावों से होकर गुज़रते हुए हम सभी ने अपने-अपने सुख-दुःख में अपने बाल सफ़ेद किया है, यही हमारी पूँजी है। दर्द एक अतिथि जैसा है जो मन की देहरी पर टिका ही रहता है, तो कभी वह पिया के घर आने पर फुर्र से उड़ भी जाता है उम्र की भट्टी में अनुभवों के भुट्टे पकाते हुए आपने ये हाइकु रचे हैं। वाक़ई इस पुरुषवादी युग में स्त्रियों को संघर्षों के साथ जीना होता है, इसलिए ही आपके ये हाइकु इन दृश्यों को शब्दांकित करने से नहीं हिचके हैं -

हवन हुई / बादलों तक गई / ज़िन्दगी धुआँ । - 316

रोज़ सोचती / बदलेगी क़िस्मत / हारी औरत - 394

छुप न सका / आँखों ने चुगली की / दर्द है दिखा। - 589

          

       इस दुनिया में भूख की एक बड़ी खाई हैजहाँ पैसों की भाषाएँ समझी जाती हैं, तब हमारी क़लम इस पर यह लिखती है कि पैसों के पीछे चक्का लगाकर भागती दुनिया एक चोर है जो हम सबके मन की शांति चुरा ले गया है

मन की शांति / लूटकर ले गया / पैसा लुटेरा। - 409

दुःख की रोटी / भरपेट है खाई / फिर भी बची। - 859

            

       इन दिनों मुंडे-मुंडे मत्तरभिन्ना के कारण विडम्बनाएँ सर उठाकर दंगल मचा रही हैं, जिसकी बानगी लिए ये हाइकु आपको अपने साथ इन दृश्यों की यात्रा पर ले जाने हेतु सक्षम हैं वाक़ई घूरती नज़रों के लिए इस समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, कृषकों की आत्महत्या का कारण और बेटियों का दर्द समझने का कोई फार्मूला हमें खोजना ही होगा 

घूरती रही / ललचाई नज़रें / शर्म से गड़ी। - 177

बावरी चिड़ी / ग़ैरों में वह ढूँढती / अपनापन। - 163 

रंग भी बँटा / हरा व केसरिया / देश के साथ। - 651

किसान हारे / ख़ुदकुशी करते, / बेबस सारे। - 731

            

       सदैव से ही प्रेम हम सबके लिए शाश्वत रूप में हम सबके जीवन में रहा है चाहे वह रिश्तों के रूप में हो या मानवता के नाते हो, इसी के कारण यह दुनिया सुन्दर और गतिशील है इस पर जितना भी लिखा जाएगा वह नया ही होगा और उसका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक की प्रस्तुति का ढंग पृथक होता है आइए इन हाइकु  के साथ अपने प्रियतम की राह निहारेंउनकी झील-सी गहरी आँखों में अपनी छवि देखें, तो कभी उनकी गुलमोहर-सी झरती सुर्ख़ गुलाबी हँसी के साथ अपने प्यार को चहकने दें -

उसकी हँसी - / झरे गुलमोहर / सुर्ख़ गुलाबी। - 222 

ख़त है आया / सन्नाटे के नाम से, / चुप्पी ने भेजा। - 238

प्रीत की भाषा, / उसकी परिभाषा / प्रीत ही जाने। - 339

गहरी झील / आँखों में है बसती / उतरो ज़रा- 890

बड़ी लजाती / अँखिया भोली-भाली / मीत को देख। - 893

       इस संग्रह के अनमोल हाइकु चुनकर इस खंड में मैंने आपके लिए सहेजा है, इनका आनन्द अवश्य लें क्योंकि ऐसे दृश्यों का ऐसा शब्दांकन सदियों में कभी-कभी ही होता हैऐसे ही हाइकु के लिए कहा गया है कि एक हाइकु रच लिया तो वह वास्तविक हाइकुकार है। चीटियों को सबने देखा, फूलों को खिलते सबने देखावर्षा में सब भीगे लेकिन जो आपने देखा वह आपका अलग दृष्टिकोण है। आइए गहने पहने हुए फसलों के साथ थोड़ा मुस्कुरा लें -

लेकर चली / चींटियों की क़तार / मीठा पहाड़। - 421

गगन हँसा / बेपरवाह धूप / साँझ से हारी। - 951

फूल यूँ खिले, / गलबहियाँ डाले / बैठे हों बच्चे। - 1019

अम्बर रोया, / मानो बच्चे से छिना / प्यारा खिलौना। - 1020

फसलें हँसी, / ज्यों धरा ने पहना / ढेरों गहना। - 1022 

          

       आपके हाइकु का लश्कर आपकी अनुभूतियों का ख़ज़ाना लिए प्रकट हुए हैं वाक़ई ये हिंदी साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। आपने इसे उकेरने में क्षेत्रीय शब्दों का जो तड़का लगाया है वो आपके हाइकु को सशक्त बनाते हैं, कहीं-कहीं बिलकुल ही नए दृश्यों को शब्दांकित करने में आप क़ामयाब हुई हैं, जो इस संग्रह की सुन्दरता को बढ़ाती है नवदृश्यों को उकेरने का सद्प्रयास और समर्पण आपके इन हाइकु के तेवर को सदैव युवा बनाए रखेंगे। इस संग्रह ने सर्वाधिक हाइकु किसी एकल संग्रह में होने का अनोखा रिकॉर्ड बनाया है


इस संग्रह ‘प्रवासी मन की बधाई और शुभकामनाएँ! 


रमेश कुमार सोनी

LIG 24, फेस - 2 

कबीर नगर 

रायपुरछत्तीसगढ़

संपर्क - 7049355476 / 9424220209

Email - rksoni1111@gmail.com

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'प्रवासी मन' हाइकु-संग्रह : डॉ.जेन्नी शबनम

प्रकाशक - अयन प्रकाशन, महरौलीनई दिल्ली, सन - 2021, पृष्ठ - 120, मूल्य - 240/-Rs.   

ISBN NO. - 978-9389999-66-2


शुभकामनाएँ - डॉ.सुधा गुप्ता जी 

भूमिका - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

विशेष : जेनी शबनम जी के हाइकु संग्रह  का जादू सिर चढ़कर बोला है समीक्षक रमेश जी ने जादूगर की तरह इसे प्रस्तुत किया है अब तो लगता है एक सार्थक सप्राण हाइकु रचो और अमर हो जाओ वैसे ही जैसे एक कॉमेंट को खोजे तारा अन्वेषी मन।प्रेम से वैराग्य तक प्रकृति से लेकर पर्यावरण तक विस्तृत है आपका रचना संसार।ऊपर से नारी की कोमल भावनाओं का आश्रय। आपका साधुवाद आपने इस अप्रतिम  धरोहर से परिचित करवाया अपनी। बधाई ! बधाया !ब्लॉग जगत का आपने बेहद का मान बढ़ाया। 


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